Saturday, 7 May 2011

ज़िन्दगी भर सोचूंगा

ओ पिता !
ओ माँ !!

शायद हम इतने दूरदर्शी नहीं थे
कि देख पाते - एक टुकड़े बाद का समय.

अब डर लगता है -
बार - बार लौट कर वापस आने में,
बस गिनता रहता हूँ -
पदचाप के स्वर
जो हमारे बीच की दूरियां नापते हैं.

तुम्हारी आँखों में अब भी तैरता है प्यार-
थोड़ी चिंता और भविष्य का थोडा अनमनापन,
लेकिन मुझे पता है -
उन आँखों के पीछे मचलती अदृश्य पीड़ा का.
युवावस्था में,
बुढ़ापे के देखे गए
सपनों कि हत्या का मैं हूँ चश्मदीद गवाह.

मुझे पता है-
परिस्थितियों ने खींच लिया है मुझे,
तुम्हारे दायरे से बाहर.

कभी मन में आता है-
तोड़ दूँ अपने पाँवो को-
क्योंकि जो पाँव तुम्हे गति नहीं दे सके,
उनका मैं क्या करूँ?
लेकिन नहीं-प्रतीक्षारत पीड़ी को तो गति देनी है.

कभी-कभी चाहता हूँ-
नोच कर फेंक दूँ अपने हाथ,
क्योंकि जो हाथ तुम्हे सहारा नहीं दे सके,
उनका मैं क्या करूँ?
लेकिन नहीं - इन्हीं कंधों पर है मेरा सारा भविष्य
इन्हीं हाथों से सहलाना है मुझे अपने बच्चों को,
जिस तरह कभी तुमने मुझे सहलाया था.

और कभी इच्छा होती है -
काट डालूं अपनी जुबान,
क्योंकि जो जुबान तुम्हारा दर्द नहीं पी सकती,
उसका मैं क्या करूँ?
लेकिन नहीं - इस जुबान पर भी जिम्मेदारियां हैं,
बहुत सी भावनाएं गूंगी हैं -
अभी मुझे शब्द
गढनॆ हैं उनके लिए.

ओ पिता!
ओ माँ !!
मुझे मालूम है - तुम मेरे पाँवो से बंधे भंवरों से परिचित हो,
मुझे ये भी मालूम है -
तुम मुझे क्षमा कर दोगे,
क्योंकि क्षमा मांगने के अतिरिक्त मैं कुछ नहीं कर सकता,
और क्षमा करने के अतिरिक्त तुम भी कुछ नहीं कर सकते.

यह सही है-
अब मैं तुम्हें पढ नहीं सकता,
तुम्हें लिख नहीं सकता
तुम्हे सुन नहीं सकता,
लेकिन मैं तुम्हें सोच सकता हूँ,
हाँ -
मैं तुम्हें जिंदगी भर सोचूंगा.


- तरुण प्रकाश

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